चिंगारी | Prity Barnwal

कहनी हैं कुछ बातें

बस एक कलम थामकर

 

क्यूँकि जब-जब इसे छोड़ा

मिली मुझे केवल विचारहीनता

चलना शुरू किया जब

थामकर हाथ अपनों का

बड़े मज़े से गुजरे कुछ दिन

और न जाने कब

एक पुल बन गया सपनों का

 

वो सपने भी क्या अजीब हुआ करते थे

मानो कोयले के भट्टी से आग धधक रही हो

शंखनाद होती थी हर दिन तमन्नाओं की

मानों नई पहचान को प्रखरता से गढ़ रही हो

क्या कहें की फिर एक दिन

अपनों ने कहा कि

“हम तुम्हारें अपनें नहीं”

मंजर तो फिर ऐसा था कि

न सपनें मिले, न पहचान ही अपनी रही

 

फिर न जानें क्यों एक दिन

पहुंची उस सोयी भट्टी के करीब

जहां न कोई आग थी,

न कोई आस

था तो केवल एक हवा का झोंका

जो उड़ा ले गया उमीदों को

 

पर कहीं दूर छिपी तलहटी में,

जलने की आस लिए

एक निकम्मी चिंगारी, इतराती हुई

फिर से धधक उठी।

__________________________________________________________________________________________

Prity Barnwal

An avid reader and researcher, Prity is a scholar of English Language & Literature. She can be reached at pritybarnwal93@gmail.com

One thought on “चिंगारी | Prity Barnwal”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *