मॉब लिंचिंग – लोकतंत्र में भीड़ – तंत्र

अभी हाल के कुछ महीनों से मॉब लिंचिंग शब्द का बेधड़क प्रयोग किया जा रहा है। चाहे वह मीडिया, सोशल मीडिया, समाचार-पत्र आदि कुछ भी हो हर जगह इस शब्द का ज़िक्र सामने आ जाता है। बहुत से लोग तो मॉब लिंचिंग शब्द का सही अर्थ भी नहीं समझ पा रहे हैं वे इसकी वास्तविकता का अनुमान कर पाने में असमर्थ हैं। मॉब लिंचिंग की दुष्परिणामों को समझने के लिए इसे परिभाषित करना नितांत आवश्यक हैं। क्योंकि यह एक ऐसा दीमक है जो पूरी व्यवस्था को ही निगल जाता है और लोकतंत्र को कलंकित करता है।

सरल शब्दो में कहा जाए तो ‘मॉब’ का अर्थ होता है ‘भीड़’ और ‘लिंचिंग’ का अर्थ है ‘हत्या’; मतलब भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या किया जाना ही मॉब लिंचिंग कहलाता है। इसे हम यूँ भी समझ सकते है कि पहले के लोग कहते थे कि समूह में रहो, एकता रहेगी तो कोई तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता लेकिन अब यह उलटा हो गया है अर्थात यही एकता अब एक भीड़ में बदल गई है और यही भीड़ एक अफवाह पर लोगों की जान ले लेती है। इस एकता वाली भीड़ का हम तो कुछ नहीं कर सकते है लेकिन जब यह समूह उन्मादी भीड़ में तब्दील हो जाता है तो हमारे भीतर सुरक्षा कम और डर की भावना ज्यादा बैठती है और यह भीड़ एक अलग तंत्र का निर्माण कर देता है जिसे आसान भाषा में कहे तो ‘भीड़तंत्र’ कह सकते है और जब यह तंत्र न्याय करने पर उतर आता है तो इसे ‘मॉब लिंचिंग’ कहते है। अन्य शब्दो में ‘मॉब लिंचिंग’ को ‘भीड़तंत्र’ का न्याय भी कह सकते हैं।

इस तरह सामाजिक दृष्टिकोण से जब कोई मॉब यानि गुस्साई भीड़ मिलकर किसी की जान ले लेती है तो ये उनका अपने तरीके से न्याय होता है तो ‘लिंचिंग’ की परिभाषा होती है कि जब कोई गुस्साई भीड़ किसी की जान ले लेती है क्योंकि भीड़ की नजरों में उस व्यक्ति ने कोई जुर्म किया होता है जो कि हो सकता है कि यह कानून की नजरों में जुर्म न हो। मतलब लिंचिंग कानून की प्रक्रिया से बाहर होती है इसमें कानून का उल्लंघन किया जाता है।

लिंचिंग क्यों होता है इसके पीछे के मनोवैज्ञानिक कारणों को जानना जरुरी है लिंचिंग के द्वारा एक सन्देश भेजने की कोशिश की जाती है इसमें मारने की संख्या की महत्ता नहीं होती है बल्कि मारने का तरीका और उद्देश्य अधिक महत्वपूर्ण होता है ताकि एक सन्देश पहुंचाया जा सके। इस तरह इसमें पब्लिक के चरित्र की क्रूरता सामने आती है। यानि गुस्साई या उन्मादी भीड़ जब खुद न्याय करने पर उतर जाती है तो उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता, कानून भी उसे रोक नहीं सकता। वह बेलगाम घोड़े की भांति अपना काम कर जाता है।

मॉब लिंचिंग क्या है इसे तो हमने विस्तार रूप में जान लिया। अभी हाल की बढ़ती घटनाओं से केंद्र सरकार हरकत में आयी है और इसे दंडनीय अपराध के तौर पर परिभाषित करने के ‘’भारतीय दंड संहिता’ में संशोधन की संभावनाओं पर विचार कर रही है। अब इसके इतिहास पर भी गौर करने की जरुरत है। ऐसा नहीं है कि ‘मॉब लिंचिंग’ केवल भारत में ही हो रहा है, दरअसल इसकी शुरुआत यूरोप से हुई थी। यूरोप के इतिहास में भीड़ द्वारा सज़ा देने का प्रावधान था। असल में लिंचिंग शब्द की उत्पत्ति अमेरिका की सिविल वॉर के दौरान हुई थी। ऐसी घटनाएं अमेरिका में खूब देखने को मिली। अमेरिकी गृहयुद्ध के खत्म होने के बाद जैसे ही कालों को बराबर के अधिकार मिले वैसे ही गोरों ने कालों की लिंचिंग शुरू कर दी थी। पहले भी राजा-महाराजा बहुत-सारे न्याय जनता पर छोड़ देते थे और ये कहते थे कि जनता अपराधी को तब तक पत्थर मारे जब तक कि उसकी जान न चली जाएं। ये भी एक तरह की मॉब लिंचिंग ही तो थी। इतिहास में देखें तो अमेरिका के लुसियाना राज्य में लोकल जेल में 14 मार्च 1891 को लिंचिंग की पहली घटना सामने आयी थी।

भारत में अगर अभी हाल के दिनों में हम देखें तो ‘मॉब लिंचिंग’ की बहुत सारी घटनाएँ हुई है और पहली घटना नागालैंड के धीमापुर में 2015 में घटी थी जब एक बलात्कारी को भीड़ ने मार डाला था। भारत में अब मॉब लिंचिंग की घटनाएं काफी आम हो गयी है। बहुत सारे केस सामने आये है जिसके कारण यह मुद्दा काफी गरमाया हुआ है:-

  • मुहम्मद अखलक (28 सितम्बर 2015) केस :- 28 सितम्बर 2015 को  मुहम्मद अखलक से शुरू हुआ था जब UP के दादरी में यह खबर फैली की उसने अपने घर में बीफ़ को स्टोर कर के रखा हुआ है या उन्होंने बीफ़ खाया है। लेकिन बाद में फोरेंसिक में पता चला कि वह मटन था बीफ़ नहीं।  खैर भीड़ ने इनको इसी अफ़वाह में मार डाला था।
  • नोमान केस सहारनपुर (अक्टूबर 2015) :- हिमांचल प्रदेश के गाँव के लोगो द्वारा सहारनपुर के 20 वर्ष के बच्चे नोमान को दर्दनाक तरीके से मार डाला गया।  ऐसा माना गया कि वह कैटल को चुरा के ले जा रहा था।
  • रफीक और हबीब केस (9 अक्टूबर 2015) :- रफीक और हबीब को UP के जिले में गाय के चमड़े को निकालने के लिए मार डाला।
  • मज़लूम अंसारी और इम्तियाज़ खान (18 मार्च 2016) :- यह एक शर्मनाक घटना थी।  दो लोग थे – मज़लूम अंसारी (32 वर्ष) और इम्तियाज़ खान (12 वर्ष) – जिन्हें इनके ही गाँव के लोगो द्वारा फ़ासी दे दी गयी थी।  यह झारखण्ड के लातेहार की घटना थी।
  • 11 जुलाई 2016 की घटना  :- गुजरात में मरे हुए गाय के चमड़े को निकालने के लिए गौरक्षकों के समूह ने एक दलित परिवार के सात सदस्यों को बुरी तरह पीटा था।  
  • 26 जुलाई 2016  :- दो मुस्लिम महिलाओं को मध्यप्रदेश में हिन्दू दल की भीड़ द्वारा यह मानकर पिता गया की वें बीफ़ खा रहीं थीं।
  • 24 अगस्त 2016  :- एक मुस्लिम कपल को हरियाणा में 10 गौरक्षकों के समूह ने मार डाला।
  • 1 अप्रैल 2017 :- अलवर में पेहलू खान को गायों के ट्रांसपोर्टिंग के लिए उसके मरने तक पीटा गया।  
  • 26  मई 2017 :-  गौरक्षकों द्वारा ही मॉब लिंचिंग की गयी।  
  • 6 जून 2017 :- एक मुस्लिम पर ही भीड़ उकसाई थी।  
  • 10 जून 2017
  • 22 जून 2017
  • 27 जून 2017
  • 29 जून 2017
  • 12 जुलाई 2017

और न जाने कब-कब। संख्याऐ अगिनत हैं।  

इस तरह पिछले दो-तीन महीनों में मॉब लिंचिंग की काफी घटनाएं सामने आयी चाहे वह गौरक्षा के सम्बन्ध में हो  या बलात्कार के सम्बन्ध में या बच्चा चोरी के सम्बन्ध में या किसी अन्य सम्बन्ध में। आंकड़ों की बात की जाए तो 2010 से 2017 तक के आठ वर्षों में कुल 63 मामले सामने आये है। इनमे से 97% पिछले तीन सालों में आये है जबसे मोदी जी की सरकार आयी है।  यह कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है बल्कि एक गहन चिंतन का विषय है। 28 भारतीय मारे जा चुके है। इन 63 मामलों में 24 मुस्लिम समुदाय के लोग है यानि 86%। 63 में से ३२ घटनाएं बीजेपी शासित राज्यों की है।

इन सबके खिलाफ काफ़ी आवाजें उठी है जिसमे एक NGO द्वारा एक कैंपेन भी शुरू हुआ ‘नॉट इन माय हाउस’ कहकर।  इसका मतलब है कि इनमे से बहुत सी घटनाओं का सम्बन्ध गायों से है यानि गायों की सुरक्षा के लिए मारना पड़ा। तो नॉट इन माय हाउस में गायें खुद कह रहीं हो कि मेरा नाम लेकर मत मारो आप किसी को इसलिए नहीं मार रहे हो की आप अन्य को बचा रहे हो बल्कि इसलिए मार रहे हो क्योंकि आप यह आपका स्वभाव है।  आप उसका किसी तरह से फायदा उठाना चाहते हो चाहे वह फायदा राजनीतिक हो अथवा अन्य। वास्तव में यह किसी गाय की रक्षा के लिए होता तो भारत में हर रोज हज़ारों गायें कचरा खाकर नहीं मर रहीं होतीं। यह दर्शाता है कि यह सिर्फ गोरक्षा से सम्बंधित नहीं है।

भारत के ‘IPC’ में लिंचिंग के खिलाफ कोई विशेष प्रावधान नहीं है बल्कि राज्यसभा में भी कहा गया है की इसके लिए किसी विशेष कानून की आवश्यकता नहीं है, जो कानून बने है उनसे ही लिंचिंग को नियंत्रित किया जा सकता है। हमारे संविधान द्वारा बहुत-सारे मूल्य सिखाये जाते है। भारतीय संविधान में तीन प्रकार की न्याय की बात होती है- सामजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक।  

इन तीनों को रूस की क्रांति (1917) से लिया गया है। सामजिक न्याय वह है जिसमें जाति, रंग, धर्म, लिंग आदि के नाम पर भेदभाव नहीं होनी चाहिए।  आर्थिक न्याय में सबको बराबर का हक़ मिलना चाहिए यानि आय और धन कुछ हाथों में न जाकर सबको बराबर मिलना चाहिए और अंत में है राजनीतिक न्याय यानि सबको बराबर का राजनीतिक हक़ मिलना चाहिए। तो लिंचिंग इन तीनों आदर्शों के विरुद्ध है।

‘फ्रांस क्रांति’ की प्रेरणा से भी भारतीय संविधान के तीन आदर्श – स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारा – लिए गए है, तो लिंचिंग इन आदर्शों के खिलाफ भी है।  

राज्य का कर्त्तव्य है कि वह लोगों को सुरक्षा प्रदान करें। अगर किसी राज्य में लिंचिंग की घटना होती हैं तो लोगों का विश्वास उस लोकत्रांत्रिक प्रणाली पर से कम हो जाता है। लिंचिंग हमारे हमारे मूल अधिकारों का भी हनन करता है। सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा है कि जीने का मतलब यह नहीं है की आप सिर्फ जी रहे है बल्कि सम्मान के साथ एक हेल्दी जीवन जीना भी इसके अभिन्न अंग है।

निष्कर्ष स्वरुप यह कहा जा सकता है कि राज्य और सरकार अपने कर्तव्यों का सही और सुचारू रूप से पालन करें। संविधान के आदर्शों और लोगों के मूल अधिकारों का हनन न होने दें। हम भारतीयों का भी यह कर्त्तव्य बनता है की सरकार के काम में सहयोग करें। लिंचिंग की घटनाओं के विरुद्ध मूक-दर्शक न बनकर उसका विरोध करें। अफवाहों पर ध्यान न दें और सबसे बड़ी बात – असंवेदनशील न बनें, तभी मॉब लिंचिंग पर अंकुश लगाया जा सकता है।


About the Columnist:

Pinky Barnwal is a Graduate in Economics. She also holds a degree in Bachelor of Education. She is a vibrant thinker, homemaker, mother and most importantly a human being with sublime aspirations.

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