“Chaar Adhuri Baatein” Abhilekh Dwivedi | Reviewed by Gunjan Singh

आज के दौर में जहाँ  हर तरफ ज़्यादातर किताबें प्यार, इश्क़ और मोहब्बत से शुरू होकर कॉलेज के किस्से कहानियों तक ख़त्म हो जाते हैं वहाँ कुछ ऐसा पढ़ना जो जीवन के उन पहलुओं के बारे में बात करता हो जो यथार्थ हैं, मन को अजीब सी ख़ुशी दे जाते हैं। हाल ही में मेरे साथ ऐसा ही कुछ हुआ। आज रात मैंने अभिलेख द्विवेदी की लिखी हुई “चार अधूरी बातें ” पढ़ी। इसमें ऐसा कुछ नहीं है जो आमतौर पर कहा न गया हो लेकिन जिस खूबसूरती से लेखक ने इन मुद्दों को कहानियों में पिरोया है वो काबिले तारीफ़ है।

ये किताब चार अलग कहानियों का संग्रह है जो अलग होते हुए भी एक दूसरे से जुड़ी  हैं। संदली , संजीदा , संयुक्ता और संध्या इन  चार स्त्रियों का मनोवैज्ञानिक चिकित्सक से इलाज करवाते वक़्त जीवन के कुछ अनछुए पन्नो से हम रूबरू होते हैं ।

शुरुआत होती है संदली से, जो कॉर्पोरेट सेक्टर में नौकरी करती है, धूम्रपान की लत से लड़ रही है और डॉक्टर के कॉलेज की दोस्त भी है। संदली की कहानी की शुरुआत थोड़ी धीमी है। पुरुषों से हावी कॉर्पोरेट की जद्दोजेहद से जूझ रही संदली का स्मोकिंग से रिश्ता बन बैठता है और वो धीरे-धीरे न चाहते हुए भी मानो अपनी ज़िन्दगी फूँक रही होती है, बिलकुल एक सिगरेट की तरह।

संदली के बताने पर हमारी दूसरी किरदार यानी की संजीदा भी उसी थेरेपिस्ट के पास आती है। संजीदा को शायरी पसंद है और वो तुकबंदी में बातें करना पसंद करती है । संजीदा की कहानी के दौरान लेखक ने एक कमाल की लय पकड़ ली और मानो जादू कर दिया। कुछ बेहतरीन शायरी यहाँ हमें पढ़ने को मिली। संजीदा का किरदार जितना खूबसूरत है उतनी ही थेरेपिस्ट और संजीदा की बातें । संजीदा खुद को लेस्बियन समझती है, लेस्बियन है या नहीं ये आपको पढ़ने के बाद ही पता चलेगा। लेखक ने  लेस्बियनिस्म टर्म को काफी उजागर करने की कोशिश की है और साथ ही शराब और घरेलु हिंसा जैसे मुद्दों को झकझोर कर रख दिया है ।

तीसरी कहानी है संयुक्ता की जो कि संजीदा की कथित लेस्बियन पार्टनर है। उसे सेक्स की लत है जिसकी वजह से वह संजीदा के कहने पर थेरेपिस्ट से मिलती है। काफी सेंशुअस चरित्र दिखाया गया है संयुक्ता का, लेकिन जैसे – जैसे परतें खुलती जाती हैं वैसे – वैसे पाठक मन कुछ भारी सा हो उठता है।

क़िस्सागोई के दौरान कई बार लेखक ने थेरेपिस्ट का स्वविचार भी इतने ईमानदारी से लिखा है कि सब कुछ बिलकुल स्वाभाविक सा लगता है। ये लेखक के तगड़े शोध का ही नतीजा है। यहाँ बाल यौन शोषण और यौन शोषण जैसे विषयों को गंभीरता से दर्शाया गया है।

आखिरी कहानी है संध्या की जो संयुक्ता की परिचित होती है और उसके कहने पर अपनी शराब की लत को छोड़ना चाहती है। संध्या का किरदार उम्र में सबसे बड़ा दिखाया गया है और किन कारणों से शराब की लत लगती है ये तब मालूम होता है जब उसके पिछली जिंदगी के किस्से खुलते हैं। सबसे ज़्यादा दिलचस्प रिश्ता थेरेपिस्ट और संध्या का रहा है ।

पूरी किताब को पढ़ते हुए मुझे शब्दों का चयन बहुत ही बेहतरीन लगा जो कि सरल होने के साथ ही हिंदी भाषा के स्तर के साथ भी इन्साफ कर पाने में सफल रहा । स्त्री के दर्द को जिस तरह शब्दों में पिरोया है वो क़ाबिले तारीफ़ है। आत्मा को भीतर तक झकझोर कर रख देने वाली कहानियां हैं ये ।

चंद पंक्तियाँ जो इन चारों चरित्रों का हाल बयां कर दे वो लेखक ने खूब लिख डाला है ।

“मैं गुम  हूँ वहाँ जहां हर कोई मौजूद है
पहचान में भी अंजानो सा मेरा वजूद है
मै टटोलती हूँ खुद को उन रास्तों में
जहा खोना और लौटना  ही मुझे खुद है
एक किरदार को छुपा लिया फरेब में
फिर भी अक्स ए आइना मेरा खुद है ।। “

हमारे आस पास कितनी ही संदली, संजीदा, संयुक्ता और संध्या होती है, लेकिन हम सबसे आसान काम करते हैं, और बस लोगों के बारे में कयास लगाते रह जाते हैं। दर्द की कोई एक परिभाषा नहीं होती, दर्द तो दर्द होता है। हाँ उससे जूझने का तरीका अलग हो सकता है।

आज के समय में थेरेपिस्ट या मानसिक विशेषज्ञों की भूमिका कितनी अहम है ये समझना ज़रूरी है और ऐसी ही एक कोशिश अभिलेख द्विवेदी की भी रही है । मै दाद देना चाहूंगी अभिलेख जी को इतनी बेहतरीन रचना के लिए जो बेधड़क और रोचक होने का साथ भावुकता से परिपूर्ण है ।

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Gunjan Singh
 is an avid reader by passion and a Software Engineer by profession. Hailing from Dhanbad, she currently resides in Pune.

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